First time I cried, I didnt know why I was born,
Last time I cried, I still didnt know why I was born
Mother's womb was a labyrinth of darkness,
With occassional sounds I had never heard
Today, my tomb holds nothing but darkness,
With unheard sounds of insects flocking in a herd
I am my only companion,
My solitude there is none to share
In the grave my spirits lie,
Full of void, filled with despair
Just as i get up to survey my graveyard,
A sense of warmth, a touch of love is felt
I see a widow weeping, her husband freshly claimed,
My soul is on fire, my spirit, with her tears doth melt
I ask my fellow grave-mate as to what this was,
With a heavy heart, he turns his back onto me
My jinx has been broken for i have seen love,
My spirit is dissolved and I am set free.
Sunday, 9 September 2007
मेघ झड़ते गए, प्यास बढती गयी
गगन में काले बादलों की उमाड़ है,
आलम में गरजती चपला की दहाड़ है।
पानी की हर बूँद में मधु कि सी मिठास है,
फिर भी हमारी क्यों ना बुझती यह प्यास है।
वर्षा का जल, ईश्वर का है आशीर्वाद,
प्रत्येक जंतु के लिए यह है महाप्रसाद।
हम मनुष्य ही है जो इसे ठुकराते है,
संतुष्टि तो दूर, अपनी प्यास और भड़्कातें हैं।
मेघों को कोई चाह नही, वे सदेव ही परमार्थी है,
ईश्वर की इस रचना में हम हि है जो स्वार्थी है।
अपना वजूद गंवाकर, मेघ हमारी फसलों को बोतें हैं,
मोह-माया के तुच्छ नुकसान पर हम ही हैं जो रोते हैं।
मेघों के आत्मसमर्पण से धरती की कालिमा छंट रही है,
हिंसा के प्रदर्शन से मनुष्यता खंडों में बट रही है।
श्मशान है वहाँ, फुलवारियां होनी चाहिऐ जहाँ,
हैवान है वहाँ, इन्सान होने चाहिऐ जहाँ।
मेघों कि तत्परता देख, स्वयम भगवन भी डर रह है,
हिंसा की बर्बरता से शरीर का मानव मर रहा है।
हे देव, झुका कर रख दे आज यह आसमान,
तृप्त कर उस हिंसा को, जिसका प्यासा है इन्सान।
आलम में गरजती चपला की दहाड़ है।
पानी की हर बूँद में मधु कि सी मिठास है,
फिर भी हमारी क्यों ना बुझती यह प्यास है।
वर्षा का जल, ईश्वर का है आशीर्वाद,
प्रत्येक जंतु के लिए यह है महाप्रसाद।
हम मनुष्य ही है जो इसे ठुकराते है,
संतुष्टि तो दूर, अपनी प्यास और भड़्कातें हैं।
मेघों को कोई चाह नही, वे सदेव ही परमार्थी है,
ईश्वर की इस रचना में हम हि है जो स्वार्थी है।
अपना वजूद गंवाकर, मेघ हमारी फसलों को बोतें हैं,
मोह-माया के तुच्छ नुकसान पर हम ही हैं जो रोते हैं।
मेघों के आत्मसमर्पण से धरती की कालिमा छंट रही है,
हिंसा के प्रदर्शन से मनुष्यता खंडों में बट रही है।
श्मशान है वहाँ, फुलवारियां होनी चाहिऐ जहाँ,
हैवान है वहाँ, इन्सान होने चाहिऐ जहाँ।
मेघों कि तत्परता देख, स्वयम भगवन भी डर रह है,
हिंसा की बर्बरता से शरीर का मानव मर रहा है।
हे देव, झुका कर रख दे आज यह आसमान,
तृप्त कर उस हिंसा को, जिसका प्यासा है इन्सान।
Welcome
So you have somehow managed to kindle the interest in you to have a peek into this sublime creation of a free mind. Welcome aboard my friend, join me in my journey through the labyrinth of this archaic world and let us understand the psyche of our race as it evolves!
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