Sunday, 9 September 2007

मेघ झड़ते गए, प्यास बढती गयी

गगन में काले बादलों की उमाड़ है,
आलम में गरजती चपला की दहाड़ है।
पानी की हर बूँद में मधु कि सी मिठास है,
फिर भी हमारी क्यों ना बुझती यह प्यास है।

वर्षा का जल, ईश्वर का है आशीर्वाद,
प्रत्येक जंतु के लिए यह है महाप्रसाद।
हम मनुष्य ही है जो इसे ठुकराते है,
संतुष्टि तो दूर, अपनी प्यास और भड़्कातें हैं।
मेघों को कोई चाह नही, वे सदेव ही परमार्थी है,
ईश्वर की इस रचना में हम हि है जो स्वार्थी है।

अपना वजूद गंवाकर, मेघ हमारी फसलों को बोतें हैं,
मोह-माया के तुच्छ नुकसान पर हम ही हैं जो रोते हैं।
मेघों के आत्मसमर्पण से धरती की कालिमा छंट रही है,
हिंसा के प्रदर्शन से मनुष्यता खंडों में बट रही है।
श्मशान है वहाँ, फुलवारियां होनी चाहिऐ जहाँ,
हैवान है वहाँ, इन्सान होने चाहिऐ जहाँ।

मेघों कि तत्परता देख, स्वयम भगवन भी डर रह है,
हिंसा की बर्बरता से शरीर का मानव मर रहा है।
हे देव, झुका कर रख दे आज यह आसमान,
तृप्त कर उस हिंसा को, जिसका प्यासा है इन्सान।

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